{"seoTitle":"दबे पाँव — समंदर को छोड़ कर फिर उसमें लौट आने की एक छोटी कविता","seoDescription":"एक छोटी कविता उस स्त्री के बारे में जो दबे पाँव समंदर से बाहर आती है, किनारे पर रुकती है, और — एक मुस्कान के साथ — उन लहरों में लौट जाती है जो अब भी उसे बुला रही हैं। पेम्बा उमोजा द्वारा।","keywords":"दबे पाँव कविता, समंदर की कविता, सागर की कविता, विरह की कविता, छोड़ने और लौटने की कविता, चिंतनशील कविता, पेम्बा उमोजा की कविताएँ","line1":"वह पानी से दबे पाँव निकली","line2":"मानो वह जाना ही नहीं चाहती थी।","line3":"","line4":"सच तो यह था,","line5":"कि वह थक गई थी।","line6":"","line7":"वह नहा चुकी थी,","line8":"भीग चुकी थी,","line9":"लहरों में अटखेलियाँ कर चुकी थी","line10":"बहुत, बहुत देर तक।","line11":"","line12":"उसकी त्वचा मुरझा गई थी","line13":"और सिकुड़ गई थी","line14":"लहरों की थपकियों से।","line15":"","line16":"आराम इंतज़ार कर रहा था","line17":"किनारे पर,","line18":"गहरी रेत के भीतर।","line19":"","line20":"पर हाय,","line21":"लहरें अब भी उसे बुला रही थीं।","line22":"","line23":"भले ही वह पानी से दबे पाँव निकली,","line24":"वह रुकी,","line25":"लहरों को सुना,","line26":"वापस मुड़ी,","line27":"और एक मुस्कान के साथ,","line28":"समंदर में लौट गई।"}