{"seoTitle":"विजेता - अहंकार और समर्पण पर एक लघु कविता","seoDescription":"पेम्बा उमोजा की एक लघु कविता, फ़रवरी की धूप में एक आदमी की, जिसकी जीतें उसके अहं को सहारा देती थीं और हारें उन्हें बहा ले जाती थीं, जब तक केवल समर्पण ही शेष रहा।","keywords":"विजेता कविता, अहंकार पर कविता, समर्पण पर कविता, अहं पर कविता, सर्दियों की कविता, चिंतनशील कविता, पेम्बा उमोजा की कविताएँ","line1":"विजेता सड़क के मोड़ पर खड़ा था और फ़रवरी की धूप उसका चेहरा सेंक रही थी।","line2":"","line3":"अनगिनत अनर्जित जीतों से त्रस्त।","line4":"","line5":"और कुछ विनाशकारी हारों से।","line6":"","line7":"उसे शरण केवल उस दिव्य ऊष्मा के समर्पण में मिली जो उसके ढलते चेहरे को थाम रही थी।","line8":"","line9":"समर्पण के सिवा वह और क्या कर सकता था?  उसकी जीतें उसके अहं को क्षण भर ही सहारा देती थीं।  उसकी हारें उन्हें बहा ले जाती थीं।","line10":"","line11":"वहाँ, सर्दियों के ढलते सूरज के नीचे।","line12":"","line13":"उसकी एकमात्र आशा थी अपने अहंकार को फुटपाथ के किनारे की बर्फ़ में छोड़ देना।","line14":"","line15":"और उसे वहीं जीवन के बाक़ी मलबे के साथ पिघलने देना।"}