{"s1l1":"मैं हर जगह गया","s1l2":"पर मैंने सब कुछ नहीं देखा।","s2l1":"सब कुछ देखना असंभव है।","s3l1":"सारे हिस्से।","s3l2":"सारी नदियाँ।","s3l3":"सारे पहाड़।","s3l4":"घाटियाँ।","s3l5":"जंगल।","s3l6":"कस्बे।","s4l1":"सारे लोगों को जानना असंभव है।","s4l2":"सारी भाषाएँ बोलना।","s4l3":"सारी संस्कृतियों को जानना।","s5l1":"बस जब हम आँखें बंद करते हैं","s5l2":"तभी हम सब कुछ देख पाते हैं।","s5l3":"कहीं भी जाए बिना।","seoTitle":"सब कुछ देखना — पेम्बा उमोजा की कविता","seoDescription":"यात्रा की सीमाओं और उस दृष्टि पर एक शांत कविता, जो आँखें बंद करते ही खुल जाती है। पेम्बा उमोजा द्वारा।","keywords":"कल्पना पर कविता, यात्रा पर कविता, चिंतनशील कविता, पेम्बा उमोजा की कविताएँ"}