{"seoTitle":"हरे पत्ते — बचपन के पेड़ों और घर वापसी पर एक कविता","seoDescription":"बचपन में एक प्रिय पेड़ पर चढ़ने की कोमल स्मृति — हरी छतरी, शरीर की स्मृति, और वह मौन स्वागत जो अब भी प्रतीक्षा कर रहा है। पेम्बा उमोजा की एक चिंतनशील कविता।","keywords":"बचपन पर कविता, पेड़ पर चढ़ने की कविता, प्रकृति और स्मृति की कविता, घर वापसी की कविता, हरे पत्ते कविता, पेम्बा उमोजा की कविताएँ","s1l1":"याद करो हरे पत्ते कैसे दिखते थे","s1l2":"जब तुम हरी घास पर पीठ के बल लेटे थे","s1l3":"एक चित्तीदार हरी दुनिया में,","s2l1":"या कैसे चमकते हरे पत्ते","s2l2":"स्नेही हाथों जैसे लगते थे","s2l3":"तुम्हें गले लगाते हुए","s2l4":"जब तुम मोटी शाखाओं पर चढ़ते थे।","s3l1":"वह पहली शाखा","s3l2":"हमेशा एक बड़ी छलांग होती थी,","s3l3":"लेकिन तुमने उसे पार कर लिया।","s4l1":"और क्या तुम्हें अब भी अपना रास्ता याद है?","s5l1":"दाहिना पैर यहाँ,","s5l2":"बायाँ हाथ वहाँ।","s6l1":"खींचो, इस डाली के चारों ओर घूम जाओ,","s6l2":"उस डाली के नीचे झुक जाओ।","s7l1":"हरे हाथ,","s7l2":"शाखाएँ,","s7l3":"विशाल तना","s7l4":"सदा रास्ता फुसफुसाते थे:","s8l1":"तुम यहाँ सुरक्षित हो।","s8l2":"घर में स्वागत है।","s8l3":"तुम फिर कब आओगे?"}