{"line1":"बारिश में बाहर नग्न लेटा हुआ,","line2":"ठंडी बूँदें बरसती हैं मेरी झनझनाती सुन्नता पर।","line3":"","line4":"पानी की धाराएँ","line5":"नीचे एक भूलभुलैया में बहती हैं।","line6":"","line7":"हाथ फैलाए हुए,","line8":"सड़क पर मुँह के बल—","line9":"","line10":"कोई सीमा नहीं,","line11":"कोई भय नहीं।","line12":"","line13":"मैं आनंद में हूँ।","line14":"","line15":"तुम्हारा प्रेम मुझे समेट लेता है;","line16":"मैं तुममें समाहित हूँ।","seoTitle":"समाहित — समर्पण, बारिश और प्रेम की कविता","seoDescription":"बारिश में नग्न लेटकर आनंद और प्रेम के प्रति समर्पण की कविता — जहाँ ठंडी बूँदें झनझनाती सुन्नता पर गिरती हैं और प्रेम पूरी तरह समेट लेता है। पेम्बा उमोजा द्वारा।","keywords":"समाहित कविता, बारिश कविता, समर्पण कविता, प्रेम कविता, पेम्बा उमोजा"}