{"seoTitle":"मुझे पियो — विस्तार से जीने पर एक कविता, पेम्बा उमोजा द्वारा","seoDescription":"एक बढ़ता चाँद शहर की खिड़की से पुकारता है: झलक से अधिक लो, घूँट से अधिक करो। पेम्बा उमोजा की चिंतनशील कविता।","keywords":"चाँद पर कविता, पूर्ण जीवन कविता, यात्रा कविता, चिंतनशील कविता, पेम्बा उमोजा की कविताएँ","s1l1":"शहर की एक खिड़की","s1l2":"के सामने","s1l3":"एक बढ़ता चाँद","s1l4":"जो पुकारता है:","s2l1":"\"झलक से अधिक लो।","s3l1":"घूँट भर से ज़्यादा पियो।","s4l1":"मुझे पीपों भर पीओ।\"","s5l1":"किसी जेल की कोठरी से नहीं","s5l2":"जो परदेदार लकड़ी की खिड़कियों से घिरी हो।","s6l1":"मुझे पीओ पालों के नीचे से","s6l2":"खुले समुद्र पर","s7l1":"खजूर के पत्तों के नीचे से","s8l1":"ऊँचे पहाड़ी रास्तों से","s9l1":"तारों भरी रातों के बीच","s9l2":"लहराते रेगिस्तानी टीलों पर।"}