{"line1":"हवा इतनी पतली है,","line2":"मुश्किल से साँस आती है।","line3":"एक बादल के अंदर","line4":"पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण—","line5":"कोहरे का हर पहलू तुम्हारी याद लिए चलता है:","line6":"तुम्हारी हँसी","line7":"तुम्हारी चोरी नज़र","line8":"तुम्हारे भारी कदम आगे बढ़ते हुए।","line9":"क्या ठंड में जमता सिर्फ मैं ही हूँ,","line10":"पहाड़ी की चोटी पर अकेला?","line11":"इतना जमा कि हिल नहीं सकता","line12":"जाने-पहचाने बादल गुज़रते हैं—","line13":"तंतु और भ्रम","line14":"जो मेरे दिल को गर्म रखते हैं","line15":"जबकि मेरा शरीर जमता है","line16":"और मेरी आत्मा बारिश में बदल जाती है","seoTitle":"बादल में फँसा — पहाड़ी पर तड़प और याद की कविता","seoDescription":"अकेलेपन और तड़प की एक चिंतनशील कविता, जहाँ बादल प्रियजन की यादें लिए चलते हैं — पेंबा उमोजा द्वारा।","keywords":"बादल कविता, तड़प कविता, पहाड़ी कविता, याद और अकेलापन, चिंतनशील कविता, पेंबा उमोजा कविता"}