दो दिन का नायक
एक मुलाकात जो सब बदल देती है

"याकूब कहाँ है?"
"मोम्बासा में।"
"आखिरी बार वो घर कब आया था?"
"सबसे लंबा समय सात साल रहा है।"
"सात साल बिना अपने पिता से मिले?"
"हाँ, शायद उसकी पत्नी उसे जाने नहीं देती।"
"क्यों, वो पिंजरे में है? उसने ताला लगाकर चाबी फेंक दी?"
"पता नहीं।"
"खैर, पापा अब बीमार हैं। तुम एक हफ्ते से यहाँ हो। मैं एक हफ्ते के लिए आया। मेरी एक हफ्ते के लिए आई। याकूब?"
पापा छड़ी लेकर अंदर आते हैं, ऑक्सीजन लगी हुई।
डॉक्टरों ने उनकी पीठ में छेद करके फेफड़ों से तरल निकाला।
"अरे पापा, आपके चेहरे पर बड़ी मुस्कान है। अच्छी खबर?"
"हाँ, याकूब कुछ दिनों के लिए आ रहा है।"
"सचमुच? बहुत अच्छा। कितनी रातें?"
"बस एक, लेकिन वो दो दिन रहेगा।"
"अच्छा। और फिर वापस मोम्बासा?"
"वो नूरू से ज्यादा देर दूर नहीं रह सकता।"
साफ़-सुथरी सफेद कमीज़ पहने पड़ोसी अंदर आता है।
पापा पुकारते हैं, "मैंने तुम्हें बताया कि मेरा बेटा याकूब आ रहा है?"
"जब तक वो यहाँ है, मेरी मदद कर पाएगा।"
"यह तो बहुत अच्छा है," पड़ोसी जवाब देता है।
"वो तो सच्चे नायक लगता है।"
पापा मुस्कुराते हैं।
पेम्बा उमोजा की एक कथा