रेल की दावत
साथ होती तो कैसी दावत होती
व्लादिकाव्काज़ से मिनेरालनिए वोदी जा रही रेल में बहुत-से लोग थे। वह रुकती और चलती। रुकती और चलती। पटरियों पर ठहरी हुई वह जैसे ही देर लगाती, लोग बेचैन होने लगते। बेचैनी से बढ़कर, वे भूखे होने लगे।
एक स्त्री, जिसके बाल कोयल जैसे काले थे, ने क्लेमेंटाइन का बड़ा थैला निकाला। उसके पास और कुछ नहीं था, पर उसमें कम से कम बीस तो रहे ही होंगे।
स्लेटी टोपी पहने एक आदमी ने सफ़ेद पनीर का आधा बड़ा चक्का निकाला। उसके पास बस यही था। यही, और उसे काटने का चाकू।
रॉयल नीली स्वेटर में एक छोटी लड़की ने ताज़ी सेंकी हुई काली रोटी की एक लोई निकाली। उसके पास बस यही था।
एक बुज़ुर्ग, जिसके बिखरे हुए स्लेटी बाल और फूला हुआ पेट था, अपनी बायीं हथेली से चेहरा ढके हुए थे, पर उसके नीचे से एक आँख से झाँक रहे थे। उनके पास बस उनकी निगाहें थीं।
पीली पोशाक में नन्हें बच्चे को संभाले एक नौजवान माँ की प्राम के नीचे पानी की कुछ बोतलें थीं। उसके पास बस यही था। यह, और उसका बच्चा।
"उस काली रोटी के साथ पनीर का एक टुकड़ा कितना अच्छा लगता ना?" बिखरे बालों वाले बुज़ुर्ग धीमे से बुदबुदाए। यह सोचकर कि कोई उन्हें नहीं सुन रहा।
"और साथ में एक क्लेमेंटाइन," वे बड़बड़ाए।
स्लेटी टोपी वाले आदमी ने नमकीन पनीर का एक और कौर लिया। वह बहुत प्यासा था। "एक घूँट पानी मिल जाता, या कम से कम एक क्लेमेंटाइन," वह बुदबुदाया, यह सोचकर कि कोई उसे नहीं सुन रहा।
बच्चे वाली नौजवान माँ अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। उसे काली रोटी और सफ़ेद पनीर की महक आ रही थी, पीछे बैठी काले बालों वाली स्त्री को क्लेमेंटाइन चूसते सुन रही थी।
रॉयल नीली स्वेटर वाली लड़की स्लेटी टोपी वाले आदमी को पनीर काटते देख रही थी।
रेल फिर पटरियों पर चलने लगी।
हर कोई अपना खाना खाता रहा, एक आँख दूसरों की थालियों पर रखकर।
बिखरे स्लेटी बालों और फूले पेट वाले बुज़ुर्ग ने अपना चेहरा दोनों हथेलियों में गिरा दिया।
साथ मिलकर—यह कैसी दावत बन जाती!
A story by Pemba Umoja