गुलाब
एक अजनबी, एक कुआँ, और भोर में जो शेष रहा
जब चादर ओढ़े वह दर्शक गाँव में आया
उसके हाथ में एक लालटेन थी। उसकी लौ बैंगनी और लाल का अजीब-सा मिश्रण थी। उसके बाएँ सीने पर लंबे डंठल वाला काँटों भरा एक गुलाब लगा था।
वह नंगे पाँव था। उसके पास कोई सामान नहीं था।
गाँववाले सोचने लगे, कहीं वे किसी सपने के भीतर तो नहीं जागे।
वह चला और गाँव के कुएँ के पास रुका। रस्सी से बाल्टी खींची। प्यास बुझाने को कटोरी होंठों से लगाई।
गुलाबी रंग का पानी उसके पैर की उँगलियों के बीच से बह निकला। उसके पैरों के चारों ओर एक ताल बना दी।
एक भारी कोहरा शहर में लुढ़कता आया। टम्बलवीड की तरह। उसने उसे ढक लिया। हवा गरजी और गाँववालों के दरवाज़ों पर दस्तक दी।
उन्होंने दरवाज़े नहीं खोले। आँधी थम गई। भोर के साथ मौन उतरा।
कुएँ के पास कुछ नहीं बचा। सिवाय एक लाल गुलाब के। पत्थर की दरारों से उगता हुआ।
A story by Pemba Umoja