माँ देनाली
महान पर्वत

उन सबको समर्पित जिन्हें पर्वत ने परखा और जो आज भी कृतज्ञ हैं, और उन सबको जो कभी लौटकर नहीं आए।
माँ देनाली ने नीचे तंबुओं में सिमटे पर्वतारोहियों के छोटे-से दल को देखा। उसने मन ही मन सोचा, मैं इन्हें परखूँगी। ये मेरी चोटी तक पहुँचने के लिए मेरी ढलानों पर आए हैं, पर मुझे इनकी नीयत परखनी होगी। और उसने एक भयंकर तूफ़ान उठा दिया।
हवाएँ तेज़ रफ़्तार से चलीं। आसमान से बर्फ़ ढेरों में गिरी। पर्वतारोही अपने तंबुओं में दुबके रहे। मोटे स्लीपिंग बैग के बावजूद रातों में उनके पैर जम जाते थे।
"मैं अपनी सीमा पर पहुँच रहा हूँ," एक पर्वतारोही चिल्लाया।
"मुझसे अब और नहीं सहा जाता," दूसरे ने शिकायत की।
"देखते हैं सबसे पहले कौन गिरता है," पहले वाले ने ताना मारा।
कुछ और पर्वतारोही भी थे जो डर के बावजूद हौसला बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहे थे।
"मैं यहाँ होने के लिए कृतज्ञ हूँ," एक ने कहा।
"हम यहाँ इसलिए नहीं हैं कि यह आसान है। हम यहाँ इसलिए हैं कि यह कठिन है," दूसरे ने कहा।
"यही वह समय है जब हम बढ़ते हैं," तीसरे ने कहा।
माँ देनाली तूफ़ान के बीच से उन विनम्र पर्वतारोहियों को देखकर मुस्कुराई। ये थोड़े-से लोग सही कारणों से यहाँ हैं। मैं इन्हें रास्ता दूँगी। पर इन दूसरों को मैं आगे नहीं जाने दूँगी। ये तो बस मुझे अपनी विजयों की सूची में जोड़ना चाहते हैं। इनकी हिम्मत कैसे हुई मेरी ढलानों पर शिकायत करने की।
और दृढ़ संकल्प के साथ माँ देनाली ने तूफ़ान को और तेज़ कर दिया, यहाँ तक कि कड़वाहट से भरे लोग अपनी सीमा पर टूट गए और पहाड़ से नीचे उतरने लगे।
और जब वे चले गए, दूर, बहुत दूर, तो माँ देनाली ने सारे बादल हटा दिए और अपनी चोटियों की रीढ़ का अद्भुत सौंदर्य प्रकट किया। बर्फ़ से ढकी उसकी ढलानें चमकीले नीले आसमान के नीचे झिलमिला उठीं।
अपनी लंबी, सजग, स्नेहभरी निगाह के नीचे माँ देनाली ने बचे हुए उन पर्वतारोहियों को रास्ता दिया जिन्होंने धैर्य रखा था। वे उसकी उस्तरे-सी तीखी रीढ़ों पर चढ़े और कृतज्ञता, आनंद और विस्मय से भरे हृदय लिए चोटी तक पहुँचे।
माँ देनाली जानती थी कि ये पर्वतारोही उसकी चोटियों की भव्यता को दुनिया के साथ बाँटेंगे।
और उन्होंने ऐसा ही किया।
पेम्बा उमोजा की एक कथा