छोटी हारें
दो लड़कियाँ, एक पैडलबोर्ड, और गहरा पानी
वे झील के बीचों-बीच, बहुत दूर थीं। ग्यारह साल की दो लड़कियाँ, जीवन की शुरुआत कर रही थीं।
मैं यहाँ से कूदकर किनारे तक तैरकर जाऊँगी।
पूरा रास्ता?
हाँ, मैं कर सकती हूँ।
ठीक है, सहेली ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, और पैडल चलाते हुए दूर चली गई, उसे झील के बीच में अकेला छोड़कर।
तुम बहुत दूर जा रही हो।
क्या तुम चाहती हो मैं तुम्हारे लिए आऊँ?
नहीं, मैं कर सकती हूँ। मुझे तैरना आता है।
ठीक है, उसकी सहेली ने कहा, और पैडल चलाते हुए और भी दूर चली गई, उसकी कुटिल मुस्कान और चौड़ी हो गई।
अरे, तुम बहुत दूर जा रही हो।
तो क्या तुम चाहती हो मैं तुम्हें लेने आऊँ?
नहीं, मैं कर सकती हूँ। मुझे तैरना आता है।
उसकी सहेली खिलखिलाकर हँस पड़ी।
यहाँ कुछ बहुत बड़ी मछलियाँ हैं।
ओह नहीं। क्या वे काटती हैं?
हाँ।
क्या दर्द होता है?
हाँ।
लगता नहीं कि तुम ज़्यादा दूर पहुँच पा रही हो।
पहुँच रही हूँ। बस तुम चल रही हो।
उसकी सहेली ने ज़ोर से पैडल से पानी छपछपाया, उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।
मुझे लेने आओ। मुड़ो और मुझे लेने आओ।
उसकी सहेली ने पैडलबोर्ड को वापस मोड़ा।
किनारे पर उसकी माँ और सहेली की हँसी छूट गई।
अरे, क्या तुम मुझ पर हँस रही हो, माँ?
नहीं, बेटा, हम तो बस बातें कर रहे हैं।
वह थोड़ी और हिचकिचाते हुए पैडलबोर्ड पर चढ़ी।
गोदी तक के रास्ते में, उसे कोई भी बड़ी मछली नहीं दिखी।
वे ज़रूर तैरकर दूर, बहुत दूर चली गई होंगी।
A story by Pemba Umoja