कठोर कवच दिवस
क्या होता है जब एक दयालु हृदय एक कठोर कवच धारण करने का निर्णय लेता है

“इतने संवेदनशील मत बनो,” माँ कछुआ ने पापा कछुआ पर ताना कसा। “हम सब में तुम्हारा कवच सबसे बड़ा है।”
“बच्चे मेरा सम्मान नहीं करते। मैं अपने पापा के साथ वैसा व्यवहार कभी नहीं करता जैसा वे मेरे साथ करते हैं।”
“तुम बहुत संवेदनशील हो। मैं अब इसके बारे में और नहीं सुनना चाहती।”
“खैर, शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ सिर्फ़ मेरे ही पास दिल है। अगर मैं उनके साथ वैसा ही व्यवहार करूँ जैसा वे मेरे साथ करते हैं, तो उन्हें भी यह पसंद नहीं आएगा।”
माँ कछुआ ने निराशा में अपना सिर हिलाया।
“असल में, मैं यही करने जा रहा हूँ। आज से, मैं इस दिन को ‘कठोर कवच दिवस’ कहूँगा,” उसने मन ही मन सोचा।
तभी, सबसे छोटे बच्चे, नन्हे टॉमी, को छींक आई। पापा को “भगवान तुम्हारा भला करे” कहने की इच्छा हुई। लेकिन किसी और ने कुछ नहीं कहा। “मैं क्यों कहूँ?” उसने सोचा।
तभी, पापा को शौच करने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने हिलने-डुलने की ज़हमत नहीं उठाई। आम तौर पर वह झाड़ियों की ओर चले जाते थे, लेकिन कोई और ऐसा कभी नहीं करता था। “मैं क्यों करूँ?” उसने सोचा। सब हैरान लग रहे थे कि उन्होंने खुले में ही गंदगी फैला दी।
“मुझे एक मज़बूत कवच और एक छोटा दिल चाहिए,” उसने सोचा।
बच्चों को फिर से भूख लगने लगी। उन्होंने बाद के लिए कुछ भूसा बचाने के बजाय अपना इकट्ठा किया हुआ सब कुछ खा लिया था। वे इस उम्मीद में पास आए कि पापा कछुआ उन्हें अपने हिस्से में से कुछ देंगे, जैसा कि वह हमेशा करते थे।
“इस बार नहीं। यह मेरा है,” पापा कछुआ ने कहा। “मैंने तुमसे हज़ार बार कहा है कि अपने इकट्ठे किए हुए भोजन में से कुछ बचा लिया करो। तुमने न सुनने का फ़ैसला किया।”
पापा कछुआ के पास बचाया हुआ भूसे का एक अच्छा गट्ठर था। उन्होंने वह सब ठीक उनके सामने खा लिया।
परिवार ने एक-दूसरे को देखा, वे चौंके हुए और भ्रमित थे।
पापा कछुआ हँसे। “मुझे याद है जब तुम पैदा हुए थे, नन्हे टॉमी। मैं बहुत खुश था। मुझे याद है कि तुम पहाड़ी से कैसे लुढ़क गए थे क्योंकि तुम अपने कवच में संतुलन नहीं बना पा रहे थे।”
“मैं भी वहाँ थी,” माँ कछुआ ने कहा। “तुम्हारा मतलब है, ‘हमें’ याद है?”
“ओह, मुझे तो याद नहीं कि तुम वहाँ थीं, माँ। मैं नन्हे टॉमी की बात कर रहा हूँ। मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा।”
माँ कछुआ का चेहरा चमकीले हरे रंग का हो गया।
पापा कछुआ ने अपनी चोंच से उसे नीची नज़र से देखा। “इतनी संवेदनशील मत बनो, माँ कछुआ!”
बच्चों ने एक-दूसरे पर नज़र डाली। “उनके पापा के कवच के अंदर यह नया कछुआ कौन था?” उन्होंने सोचा।
जब वे अकेले थे, तो उन्होंने एक-दूसरे से फुसफुसाकर कहा, “पापा को क्या हो गया है? वह हाल ही में बिल्कुल भी अच्छे नहीं रहे हैं।”
अगले दिन, बच्चे कुछ अतिरिक्त भूसा लेकर आए—अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पापा के लिए, जैसा कि उन्होंने पहले कई बार किया था।
“यह आपके लिए है, पापा।”
पापा कछुआ ने उन्हें देखा। उनका दिल खुशी से खिल उठा।
“कठोर कवच दिवस समाप्त हुआ,” उसने सोचा।
नन्हे टॉमी ने थोड़ा ज़्यादा भूसा पकड़ा हुआ था। उसे फिर से छींक आई।
“भगवान तुम्हारा भला करे!” पापा कछुआ बोल उठे।
“भगवान तुम्हारा भला करे!” बाकी परिवार ने एक साथ कहा।
“और हमारे परिवार का भी भला हो,” पापा कछुआ ने मुस्कुराते हुए अपना कठोर कवच उनके कवचों से रगड़ते हुए सोचा।
पेम्बा उमोजा की एक कथा