भोर

एक यात्री, एक टोपी, और दूसरों के तिरस्कार की तपिश

भोर — a story by Pemba Umoja

सुबह का सूरज किसी भाले की तरह मैंग्रोव के शिखरों को भेद रहा था, जिसकी नोक दहकते लोहे की थी। वह नाव के डेक को झुलसाता हुआ गुज़रा, यात्रियों को भेदता हुआ, चाहे वे कहीं भी खड़े हों।

अकेले एक यात्री ने चौड़ी कोर वाली टोपी से खुद को ढँक लिया, और अपनी गर्दन और सिर को एक हल्के दुपट्टे में लपेट लिया।

दूसरे यात्रियों ने उसे देख कर नाक-भौं सिकोड़ी।

“तुम एक मसखरे की तरह दिखते हो,” एक झुर्रीदार बूढ़े ने कहा, जब वे झुलसाती धूप में सिंक रहे थे, उनकी त्वचा लोहे के तवे पर तले जा रहे अंडों की तरह चिनचिना रही थी।

वह अकेला यात्री मुस्कुराया, उनकी घूरती नज़रों और कड़वे शब्दों की तपिश को सहते हुए, उसका हृदय उसकी टोपी और दुपट्टे से शीतल था।

उसने कुछ नहीं कहा, बस उनके तिरस्कार भरे शब्दों को अपने ऊपर से वैसे ही गुज़रने दिया जैसे डेक के ऊपर से किरणें गुज़र रही थीं।

यात्रियों ने भोर की तपिश को सहा।

किसी न किसी तरह, वे सब भुन गए।

A story by Pemba Umoja