लाल रुमाल वाली स्त्री
बिना शब्दों की प्रार्थना।
मैं यह नोट ईश्वर के घर में लिख रही हूँ।
आँसू चुपचाप गिरते हैं।
उसका चेहरा कठोर धूप में तपे हाथों में टिका है;
वे बेचैनी से एक घिसे हुए रुमाल को सहलाती हैं।
उसकी आँखें कमरे को खोजती हैं जैसे
किसी प्रार्थना का उत्तर ढूँढ़ रही हों।
पीली आँखें अब मेरी ओर हैं, मेरी कलम को पहचानती हैं—
मेरे अवलोकन को।
मैं ईश्वर के घर में हूँ; यहाँ दीवारें,
आड़ू और सफेद जाली की, अभी भी मजबूत खड़ी हैं।
बाहर, दुनिया टूट चुकी है—
एक देश उथल-पुथल में।
A poem by Pemba Umoja