फुसफुसाहट
जैसे आसमान में एक फुसफुसाहट
मुझे चाँद दिखता है
धूप भरे दिनों में
जैसे आसमान में एक फुसफुसाहट
एक नीले सागर के पीछे छिपी हुई
क्या तुमने कभी चाँद की धूल पर नंगे पैर चलने का सपना देखा है?
एक ऐसे नखलिस्तान की तलाश में जिसमें तारे झलकते हों?
हम सब उसी एक तारे की गरमाहट महसूस करते हैं
और चाँद के ज्वार में चलते हैं
आसमान में माता-पिता की तरह
कभी डाँटते नहीं
कभी हमें छोड़कर नहीं जाते।
हमेशा चमकते हुए
हमेशा दमकते हुए
बादलों के पीछे भी
तब भी जब
हम उन्हें
देख नहीं पाते।
A poem by Pemba Umoja