कब

वर्तमान के लिए एक छोटा-सा गीत

कब — a poem by Pemba Umoja

कब

न जानूँ कहाँ

न जानूँ क्यों

न जानूँ कैसे

या क्या

इनमें से कुछ नहीं जानता मैं

बस कब

मैं थामे हूँ

इतने पास

बस कब

मैं साँस लेता हूँ

भीतर और बाहर

बस कब

लहरों की तरह धड़कता है

मेरी नसों में

बस कब

सबसे मीठे

पल

बस कब

एक ऐसी दुनिया में

जो किसी की प्रतीक्षा नहीं करती

और कुछ न जानूँ

बस कब

और वह कब

बन जाए

अभी।

Pemba Umoja की एक कविता