मेरे साथ चलो
पुराने साथियों को पुकार
राह हो गई है दीर्घ
और मैं हूँ क्लांत।
युगों के मित्र
अँधेरों में सिमट गए हैं
यथा तेंदुवे ताकते हैं
किसी काली गुहा से।
एकांत में चलता हूँ
इस ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर
इन अस्थिमय चरणों से
जो जीर्ण हो चले हैं।
बाहर आओ और चलो
मेरे संग फिर, हे चिरमित्र।
हम वृद्ध हैं
और जर्जर,
किंतु पथ
अब भी दीर्घ
और महिमामय है।
बाहर आओ और चलो
मेरे संग, मेरे सखा।
चलो मेरे साथ
एक बार फिर।
A poem by Pemba Umoja