तुम्हारी प्रतीक्षा में
दो आत्माएँ, एक अनंत रात्रि
हज़ारों रातों में
मैं बस एक ख़याल का सपना ही संजो सका
उस सुंदरता का जो हमने इस रात साझा की
दो आत्माएँ, दो शरीर,
इस धरती पर दो मानवीय पथिक,
हाथों में हाथ डाले,
हृदय से हृदय तक।
हमारे हर हिस्से के साथ
जुड़े हुए
उस सारे समय के लिए
जो कभी भी मायने रखेगा
या जिसका कोई महत्त्व होगा।
मैं अब तुम्हारी प्रतीक्षा में लेटा हूँ
उसे महसूस करने के लिए जो हमने महसूस किया है
अपने हृदयों में
अपनी त्वचा पर,
अपने हाथों में,
अपने उदर पर,
अपनी घुमड़ती आँखों में,
उस गति में
हमारी दुनियाओं की।
A poem by Pemba Umoja