Viajeros

इस तन का नाम हमारी माँ है।

Viajeros — a poem by Pemba Umoja

मैं कितने शहरों में रहा हूँ?

न जाने कहाँ, न जाने कब।

कितने पहाड़?
कितने द्वीप?
कितने जंगल?
कितने सागर?
कितने आकाश?

कितनी मुस्कुराहटों को मैंने सागर से उगते देखा है?

कितने आँसुओं को मैंने लहरों से गिरते देखा है
रेत पर?

मैं उन सब का नाम नहीं जानता,
पर जानता हूँ कि वे सब
एक ही तन के अंग हैं,
एक ही तन के।

और इस तन का नाम
हमारी माँ है।

और उसी से
हम सब पाते हैं

उसका दूध
हवा का,
रोशनी का,
प्रेम का।

A poem by Pemba Umoja