दबे पाँव
वह पानी से यूँ निकली जैसे कोई अपने प्रियतम को छोड़ता हो।

वह पानी से दबे पाँव निकली
मानो वह जाना ही नहीं चाहती थी।
सच तो यह था,
कि वह थक गई थी।
वह नहा चुकी थी,
भीग चुकी थी,
लहरों में अटखेलियाँ कर चुकी थी
बहुत, बहुत देर तक।
उसकी त्वचा मुरझा गई थी
और सिकुड़ गई थी
लहरों की थपकियों से।
आराम इंतज़ार कर रहा था
किनारे पर,
गहरी रेत के भीतर।
पर हाय,
लहरें अब भी उसे बुला रही थीं।
भले ही वह पानी से दबे पाँव निकली,
वह रुकी,
लहरों को सुना,
वापस मुड़ी,
और एक मुस्कान के साथ,
समंदर में लौट गई।
Pemba Umoja की एक कविता