यही जीवन है

ऊपर कौवे, और नीचे हमारा शोर।

यही जीवन है — a poem by Pemba Umoja

कौवे मंडराते हैं
इंसान झगड़ते हैं।
यह प्रेम की अधिक असामान्य अभिव्यक्तियों में से एक है।
कारण चाहे जो भी हो, यह एक कारण है।
सबसे सार्थक बात यही है कि कुछ भी सार्थक नहीं है।
कौवे मंडराते हैं।
भला इंसान क्यों न झगड़ें?
बात उनके आने की नहीं, बल्कि उनके प्रतीक की है।
हम सब कहीं कुछ करने और बनने की होड़ में हैं।
और यह अच्छा है, पर यह कौवों को नहीं रोकता
से
मंडराने, मंडराने,
मंडराने।

A poem by Pemba Umoja