यही है जीवन
सिर पर कौवे, और नीचे हमारा शोर।

कौवे चक्कर काटते हैं।
इंसान झगड़ते हैं।
यह प्रेम की अधिक असामान्य अभिव्यक्तियों में से एक है।
कारण चाहे जो भी हो, यह एक कारण है।
सबसे सार्थक बात यही है कि कुछ भी सार्थक नहीं।
कौवे चक्कर काटते हैं।
इंसान भला क्यों न झगड़ें?
वे स्वयं नहीं आएँगे, पर वे जिसका प्रतीक हैं, वह अवश्य आएगा।
हम सब कुछ करने की होड़ में हैं,
कहीं, कुछ बनने की।
और यह अच्छा है, पर कौवे नहीं रुकते,
बस
मंडराते,
मंडराते,
मंडराते।
Pemba Umoja की एक कविता