यात्री पुरुष

विजय के अहंकार पर

यात्री पुरुष — a poem by Pemba Umoja

क्या तुम यात्रा करते हो

क्योंकि तुम्हें नई जगहें देखना पसंद है

या क्योंकि तुम रुकने से डरते हो?

तुम जाते रहते हो

उन जगहों पर जहाँ पहले जा चुके हो

बेतरतीब से

बिना किसी ताल या कारण के

अह लेकिन मुझे याद है

तुम यात्रा इसलिए नहीं करते कि वो तुम्हें बदलती है

बल्कि जीत के लिए

शेखी बघारने के अधिकार के लिए

उस महान की सेवा में—

वो कोमल अहंकार

तुम्हारे गंजे किनारों के बीच

'मैं दुनिया का सबसे बड़ा यात्री हूँ'

तुम चाहते हो सब जानें

सब सूचियों में शीर्ष पर

और तुम चलते रहते हो

आगे क्या है इसकी चिंता कम

बल्कि पीछे कौन दौड़ रहा है

भारी सांसें लेते हुए

तुम्हारी रोएंदार गर्दन पर

Pemba Umoja की एक कविता