अब भी नीला
झींगुरों, हवाओं, और धूप संग एक शांत पहर

छिपा हुआ
जाली के पीछे
झींगुरों को सुन रहा
और हवाओं को
गुनगुनी धूप में लिपटा
हमारा संवाद का समय
मैंने अपना मानवीय समय बिता लिया है
और बातें भी
पर आज मैंने घास से बात नहीं की
न पेड़ों की डालियों से
न ही हिरणों से
वे नहीं पीते
कॉफ़ी पर कोई बात नहीं
वे क्षमा के पात्र हैं
बहुत है ताज़ी हवा
उनके प्यालों के लिए
कम से कम अभी के लिए
हमें अब भी उसकी महक याद है
जब आसमान अब भी नीले थे
Pemba Umoja की एक कविता