किसी दिन
एक महादूत की फुसफुसाहट

फुसफुसाए महादूत,
किसी दिन तुम कहोगे:
"हाँ, मैं देखता हूँ।
मैं अपनी आत्मा देखता हूँ,
अपनी नियति,
दिन की तरह स्पष्ट।
कुहासे और बादल अब उन्हें नहीं छिपाते।
और इन सब वर्षों में,
मैं बस अपने हाथ हिलाकर ही
बादल हटा सकता था।"
किसी दिन तुम खोजोगे।
किसी दिन तुम पाओगे,
फुसफुसाए महादूत,
पर केवल तब, जब तुम महसूस करोगे
कि सारा जीवन
हाथ से फिसल रहा है।
बहुत सारा समय।
बहुत सारे अवसर।
बहुत सारे खोए हुए सपने।
बहुत सारे बलिदान।
ये सब तुम्हें यहीं ले आएँगे।
अब और प्रतीक्षा मत करो।
Pemba Umoja की एक कविता