सब कुछ देखना
बंद आँख जो थाम सकती है
मैं हर जगह गया
पर मैंने सब कुछ नहीं देखा।
सब कुछ देखना असंभव है।
सारे हिस्से।
सारी नदियाँ।
सारे पहाड़।
घाटियाँ।
जंगल।
कस्बे।
सारे लोगों को जानना असंभव है।
सारी भाषाएँ बोलना।
सारी संस्कृतियों को जानना।
बस जब हम आँखें बंद करते हैं
तभी हम सब कुछ देख पाते हैं।
कहीं भी जाए बिना।
A poem by Pemba Umoja