ओरियन की ओर नौकायन
एक यात्रा, जहाँ से वापसी नहीं।
ओरियन की ओर नौकायन
एक प्रेत-पोत पर।
मैं, अकेला।
सेतु अँधेरा हो चुका है।
कप्तान पथभ्रष्ट हो गया है,
एक भी रूह नहीं भटकती,
बस खाली केबिनों की पंक्तियाँ,
झूलते हुए रस्से।
इंजन की लोरी अब भी गूँजती है
टकराती लहरों की ध्वनि के पार।
मैं, अकेला—
पोत के अग्रभाग पर बैठा,
स्थिरता से,
ओरियन की ओर बद्ध,
कालातीत,
पहुँचने की प्रतीक्षा में।
A poem by Pemba Umoja