पवनपोत
नाविक, नाव, घाट
मन है पवनपोत
हवाओं पर उड़ता हुआ
किंतु स्वयं नाविक को देख सकता है
घाट से।
एक तेज़ हवा
स्वयं को मन में लौटाती है
नाव में
पलटने के कगार पर।
जल पर एक प्रतिबिंब
मन को स्वयं में लौटाता है
घाट पर दर्शक को
नाविक को देखते हुए
हवाओं और लहरों के पार
अदृश्य रूप से चलता हुआ
घाट से नाव में
नाव से घाट में,
हम जीवन भर नौकायन करते हैं
नदियों और महासागरों पर
शांत और तूफानी
करते हुए, देखते हुए, सोचते हुए, अवलोकन करते हुए
समुद्रों को दूसरों के साथ साझा करते हुए
और घाटों को भी
A poem by Pemba Umoja