बेचैन आत्मा
एक पथिक येलोवुड वृक्षों के नीचे क्षण भर ठहरता है।
ओ बेचैन आत्मा
हरी घास पर
भटकती हुई
धरती कोमल है
तुम्हारे चरणों के नीचे
येलोवुड वृक्षों के तले।
छाया देती है
एक क्षणिक विश्राम
उन्मत्त
गरजते संसार से।
कल
बर्फ़ीले पहाड़
हिमनद
अंतहीन परिणामों की खड़ी ढलानें
प्रतीक्षा में हैं
पर अभी
ये शाखाएँ
शरण देती हैं
अपने
हरित वन में
जब फरफराते पत्ते
फुसफुसाते हैं
“कहाँ जा रहे हो?
क्यों नहीं ठहर जाते?”
बेचैन आत्मा भी
उत्तर नहीं जानती।
वह बस इतना जानती है
कि उसे जाना ही है।
A poem by Pemba Umoja