वास्तविक समय
दुनिया जैसी है, सब एक साथ

एक धुएँ भरे पब में, युवा बेचैन
नज़रें टकराकर लौटती हैं
धुंधली हवा की लकीरों से।
बच्चे, अपने नीले और सफ़ेद
स्कूल की वर्दियों में सजे, हाथ थामे—
कुछ उछलते-कूदते, कुछ हँसते हुए।
हमेशा मौजूद डामर जैसे काले धुएँ के
गुबार अदृश्य रूप से उनके पीछे घूमते हैं।
बड़ी-बड़ी थालियाँ, लबालब भरी हुई
ताज़े झींगे, केकड़े, क्रेफ़िश, कुरकुरी
कच्ची सब्ज़ियों और गर्म भाप में पकी मछली से
एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती हैं। ज़्यादातर
भोजन करने वाले, तृप्त, बड़े हिस्से
कूड़ेदान में डालने के लिए छोड़ देते हैं।
“न मम्मी, न पापा, न भाई,
न बहन। कुछ दे दो—10 रुपया।”
बच्चा अपने नन्हे हाथ अंदर बढ़ाता है
कैब में। उसकी बेजान अंडाकार आँखें
चूहों द्वारा कुतरे फफोलेदार होठों के ऊपर उठती हैं।
एक ही सुर में, वह यह वाक्य दोहराता है
बार-बार।
गुलाबी गालों वाले, सुनहरे बालों वाले, लिपटे हुए
और गर्म स्नो-सूट के भीतर सहेजे हुए, बच्चे
सर्दियों के मनोरंजन पार्क में शान से सवारी करते हैं
अपने शेटलैंड टट्टुओं पर, गुज़रते हुए
रंग-बिरंगी क्रिसमस लाइटों की एक कतार से।
नंगे पाँव और फटेहाल, दौड़ते हुए
कूड़े के ढेर में, बच्चे खिलखिलाते और छिपते हैं।
पास ही एक विशाल गाय खड़ी है, खा रही है
बदबूदार कचरे के मैदान में।
मैं हूँ
इस दुनिया में
और फिर भी,
मैं जीता हूँ
जानबूझकर नज़रअंदाज़ करते हुए
दर्द को।
कोपेनहेगन, डेनमार्क / दिल्ली, भारत
Pemba Umoja की एक कविता