बेड़ा

एक बहती रात, और वो दुनियाएँ जो एक सोता हुआ साथी खोलता है।

बेड़ा — a poem by Pemba Umoja

इस बेड़े पर मैं लेटा हूँ
मेरे पहलू में तुम
गरम लिहाफ़ में सिमटे हुए।
किन दुनियाओं के ऊपर
मैं तैरता हूँ।
गुज़रते हुए
झिलमिलाते तारों भरे
आसमानों से।
नीचे ढलानों पर
ताज़ी बिछी बर्फ़ की।
पीले फूलों की घाटियों में।
एक दिव्य सुगंध व्याप्त है।
रेशम के कीड़े, झोंकों में
सफ़ेद तारकीयता की,
बदल जाते हैं
तितलियों में
और हमारा अभिनंदन करती हैं
हमारे मार्ग में।
उनके रंग
एक ऐसे वर्णक्रम के
जो मैंने कभी नहीं देखा।
वे चक्कर काटती और नाचती हैं,
हमें राह दिखाते हुए,
इन जादुई
आसमानों के पार।
एक शांत सरोवर तक
जिस पर विश्राम करने को।
प्रकाश की किरणें
पत्तों की शय्या पर
स्वर्ण सी दमकती हैं।
तुम मेरे समक्ष सोए हो।
पलकें फड़फड़ातीं
तितलियों के पंखों की तरह
तुम किन लोकों के स्वप्न देखते हो?
क्या वे उतने ही सुंदर हैं जितने
वो लोक जहाँ तुम मुझे ले गए हो?

A poem by Pemba Umoja