धावक
वह अंतिम रेखा जो कभी समाप्त नहीं होती
वह धावक बहुत एकाग्र थी।
उसके पैर, कंधे, फेफड़े
सब एक लय में पिस रहे थे
अंतिम रेखा की ओर।
जब वह उससे आगे निकली
एक और दिखाई दी।
जब वह उससे भी आगे निकली
एक और उग आई
क्षितिज से,
फिर एक और
और फिर एक और।
“मुझे और तेज दौड़ना होगा,”
वह बुदबुदाई,
अपने डग लंबे करते हुए, अपनी गति बढ़ाते हुए,
आँखें सदा टिकी हुईं
अंतिम रेखा पर।
क्षितिज के उस पार से,
एक पछुआ हवा चली
धावक के गालों पर हवा लहराई।
खेत दिखाई देने लगे।
पीली लहरें
देहात पर लुढ़क रही थीं।
सूरजमुखी।
लेकिन फिर उसने अपना ध्यान केंद्रित किया।
“अंतिम रेखा तक,” उसने सोचा।
अपनी दृष्टि सिकोड़ते हुए
फहराते हुए ध्वज की ओर।
“सब ठीक है,”
एक आवाज़ ने फुसफुसाया।
धावक ने अपना सिर हिलाया।
पछुआ हवा का एक और झोंका आया।
उसके गालों पर हवा फिर लहराई।
उसके लंबे डग
धीमे पड़ गए
छोटे क़दमों में।
फिर
धावक रुक गई।
वह चढ़ गई
एक विशाल चट्टान पर
और बाहर निहारा
अंतहीन खेतों को
और मुस्कुराई।
“इससे बड़ी विजय और क्या होगी?”
A poem by Pemba Umoja