शंबुक का खोल

एक बूढ़ा मछुआरा और वापसी की लहर।

शंबुक का खोल — a poem by Pemba Umoja

शंबुक का खोल पड़ा था
रेतीला
सूखा
धूप में सिकुड़ा हुआ

बूढ़े मछुआरे ने
उसे उठाया
अपने बूढ़े शरीर के साथ
दोनों को लाया
हिम-से ठंडे पानी तक।

भावहीन
वह उतरा

बर्फ़ीला पानी
धीरे-धीरे चढ़ा
उसके टखनों तक
उसकी पिंडलियों तक
उसके कूल्हों तक
उसकी छाती तक
उसकी गर्दन तक
उसके पूरे तन पर

वहाँ उसने डुबकी लगाई
शंबुक का खोल थामे हुए
अपनी साँस रोके हुए
सोचता हुआ कि क्या वह कभी लौटेगा

मिनट बीतते गए
लहरों के संग

फिर एक गहरी हाँफ के साथ
वह उभरा
एक नौजवान बनकर

शंबुक का खोल चमक उठा
एक चटख बैंगनी
समुद्र से चमकाया हुआ

उसने शंबुक का खोल गिरा दिया
लहरों में
और रेत की ओर
वह लौट आया

सूरज तपने लगा
उस पर फिर से

पर ठंडा समुद्र कभी दूर न था।

A poem by Pemba Umoja