गाँठें
आत्मा का नाविक
वह है जो तुम्हें चाहिए,
जो तुम्हारे पेट को गाँठों में मरोड़ देता है,
एक कुशल नाविक की तरह
आत्मा के समुद्र को पार करता हुआ।
गाँठें मरोड़ खाती हैं,
ऐंठती हैं,
खींचती हैं,
खुरचती हैं,
और तुम अपना दिन बिताते हो,
प्लास्टिक की मुस्कानें मुस्कुराते,
सिर हिलाते,
हाँ, हाँ, हाँ, हाँ, हाँ, हाँ।
"मान जा,"
भीतर का कायर आदेश देता है।
"रस्सी काट दे,"
विद्रोही चिल्लाता है।
"छुरा उठा।
नाव जला डाल।"
ईश्वर और शैतान की तरह
एक झूले पर,
ऊपर, नीचे,
ऊपर, नीचे,
कभी संतुलन में नहीं।
नाव डोलती है,
बाएँ, दाएँ,
बाएँ, दाएँ।
लहरें आती ही रहती हैं,
एक के बाद एक।
"मान जा,"
कायर चीखता है।
"रस्सी काट दे।
नाव जला डाल,"
विद्रोही चिल्लाता है।
A poem by Pemba Umoja