बस एक बार
निर्भयता और नश्वरता के उपहार पर
महानता या मृत्यु के लिए नियत
ऐसे चलता है बिना सीमाओं वाला पुरुष या स्त्री
जो तय करता है कि डर
एक झुंझलाहट है
अब असहनीय
गले की खराश की तरह
या सिरदर्द की तरह
सुलाने योग्य
समय के सामने
जब बीस वर्ष या बीस मिनट
एक ही स्वाद देते हैं
अनंत के मुख में
जहाँ सब कुछ पीछे हट जाता है
कम ज्वार की तरह
और हम शंखों पर नंगे पाँव चलते हैं
सोचते हुए कि क्या वे देखते हैं
तहों के पीछे से
हमारी हड़बड़ी का न्याय करते हुए
चुपके से चाहते हुए
वे भी जी सकें
बीस मिनट
या बीस वर्षों के लिए
हड़बड़ाहट से
बिना डर के
जीवित
अब अमर नहीं
बस एक बार।
A poem by Pemba Umoja