तुम्हारे प्रेम का आनंद
हृदय का परमानंद
मेरे हाथ
दूर तक फैले
थाम सके केवल
तुम्हारे प्रेम का सिरा
तुम भर देते हो मेरे अंग-अंग
मेरा मांस,
मेरी गहनतम आत्मा
मैं लुढ़क रहा हूँ
एक घास की ढलान से
वसंत ऋतु में।
धूप बरस रही है।
मैं अंधा हूँ, हँसता हुआ, लड़खड़ाता हुआ।
फूलों की गंध कितनी मीठी है।
तुम्हारा अमृत कितना मधुर
कितनी आनंदमयी है वह लहर जो दौड़ती है
मेरी नसों में।
मैं कैसे जीवित रहूँ
जब मैं आनंद से मर सकता हूँ?
ईश्वर मुझसे प्रेम करते होंगे;
उन्होंने मुझे तुम्हें दिया है।
A poem by Pemba Umoja