पितामह वृक्ष
मुझे तुम्हारी शाखाएँ याद हैं।
मैं तुम्हारी ओर चल रहा हूँ।
मुझे तुम्हारी गर्मजोश शाखाएँ दिखती हैं
पहुँचने से पहले।
हर राहगीर
इस, उस की बातें करता है
एक मानव-कर्मी बनता हुआ
मानव-कर्मियों की दुनिया में।
एक दूसरे से आगे निकलने की
होड़ में
मानो हवा पानी हो
पैडल मारते हुए
पैडल मारते हुए
और तेज़ दौड़ते हुए
और तेज़
पैदल, साइकिल पर
जैसे भी बन पड़े
शिकायतें ही सुर बन जाती हैं
मानव-कर्मियों का गीत
मैं तुम्हारी ओर चल रहा हूँ।
मुझे तुम्हारी शाखाएँ याद हैं।
बिजली के
और आरी के
वार से पहले।
कितनी इच्छा है कि मैं होऊँ
तुम्हारे अंगों पर
एक आखिरी बार।
A poem by Pemba Umoja