प्रिय माँ
जीवन भर सहेजा एक ख़त।
प्रिय माँ,
मैं हूँ क्योंकि तुम थीं, माँ।
तुम्हारे लिखे उस इकलौते ख़त में, मैं तुम्हारी आवाज़ सुनता हूँ।
तुम्हारी लिखावट बहुत सुंदर थी, माँ।
तुम्हारे शब्द रेत पर लहरों की तरह बहते थे, तुम्हारी आवाज़ पानी की तरह गुनगुनी थी।
तुम जीवित हो उठती हो, माँ, ख़त में शब्दों के जीवन से।
तुम्हारा जीवन पहले वाक्य से शुरू होता है।
बार-बार और बार-बार।
तुम्हारे शब्द हमेशा जीवित रह सकते हैं, माँ।
जब तक उन्हें जीवन दिया जाए।
लिखे हुए शब्द हमें मृत्यु के बाद भी बोलने देते हैं।
जब मैं नहीं रहूँगा और ये शब्द पढ़े जाएँगे, हम साथ सुनेंगे
एक-दूसरे के पास
और शायद हम फिर से जी उठेंगे
भले ही बस एक पल के लिए।
स्नेह,
पेम्बा।
A poem by Pemba Umoja