पापा

बरामदे में एक शांत दोपहर।

पापा — a poem by Pemba Umoja

इस क्षण मैं ठीक वहीं हूँ जहाँ मैं होना चाहता हूँ,
अपने पापा के साथ।

पता नहीं ऐसे और कितने पल होंगे।

पक्षियों को सुनते हुए,
बरामदे में गिलहरियाँ,
वो मेरे पास

वो मुझे देखते हैं
जैसे मेरी कलम चलती है
सोच रहे हैं मैं क्या लिखता हूँ
जब वो अपनी कुर्सी पर धीरे-धीरे झूलते हैं
सो जाने से पहले,
एड़ियाँ फर्श पर टिकीं,
ठोड़ी अपने सपनों में डूबी।

पता नहीं ऐसे और कितने पल होंगे।

पर कम से कम यह एक पल हमेशा मेरे साथ रहेगा।

A poem by Pemba Umoja