समापन

धुंधलके में छिपी एक अनजानी सुबह।

समापन — a poem by Pemba Umoja

समय हो गया था।

वह रोशन
कमरे में चली गई।

अकेली

उसके पैर ठंडी टाइलों पर

ऊपर से आती रोशनी।

एक अनजानी सुबह
धुंधलके में छिपी।

उसने दरवाज़ा बंद कर लिया
दुनिया को पीछे छोड़कर

खुद को साफ़ करती हुई
गर्म धाराओं में

पक्का नहीं कि वो कभी लौटेगी भी

पानी को देखती हुई
उसकी गुलाबी उँगलियों के बीच से गुज़रता,

घूमता हुआ
घूमता हुआ
घूमता हुआ

नाली में नीचे।

A poem by Pemba Umoja