पर्वतारोही

एक-एक कदम, तर्क के विरुद्ध

पर्वतारोही — a poem by Pemba Umoja

मृत्यु के आगे बढ़ता

गर्म हवा में, जहाँ नदियाँ बहती हैं
सपनों में

बर्फीली चोटियों पर ऊँचाई पर

तुम्हारे मन में
तुम पहले ही मर चुके हो
हज़ार तरीकों से

बर्फ में जूते धँसते हैं

यांत्रिक रूप से
तर्क के विरुद्ध
तब भी जब दिल कहता है
और नहीं

पर साँस की तरह
कदम आगे बढ़ते हैं
एक-एक करके

डगमगाते पैरों पर
मन जीवन को थामे रखता है

यह देखने के लिए ऊपर मत देखो कि कितना दूर जाना है
पीछे मत देखो
नीचे मत देखो

बस एक और कदम

फिर एक और
और एक और

और…

A poem by Pemba Umoja