शहर का स्टू
आधुनिक सड़क से एक अभिभूत चहलक़दमी
सचमुच
जाने को कोई जगह नहीं
और फिर भी मैं घिरा हूँ
तमाशबीनों से
जो मेरी ओर ज़िगज़ैग करते आते हैं
घूरते
मुड़ते
गुज़रते
गाड़ियाँ दौड़ती हैं
धुआं फूलों की जगह ले लेता है
ऊँची आवाज़ें यह माँगती हैं
वह
कौन जाने
गाड़ियों और मशीनों की गूँज
साइरन
ठंडी मई की हवा की ठिठुरन
रेल इंजनों का कंपन
ठोस ईंट की दीवारों के विरुद्ध
और भी व्यस्त शरीर
आते
जाते
ज़िगज़ैग करते
जाने को कोई जगह नहीं
बाएँ हाथों में स्क्रीन
दाएँ में स्क्रीन
सामने स्क्रीन
पीछे
ऊपर
और नीचे
धुआं साँस लेना कठिन है
यहाँ तक कि कुत्ते भी
हताश दिखते हैं
यह कोई प्रेम कविता नहीं है
फिर भी दुनिया दौड़ती है
वे जा कहाँ रहे हैं?
सिवाय गोल-गोल
और गोल-गोल
और गोल-गोल के।
A poem by Pemba Umoja