धावा
खुरों की गरज
कीचड़ भरे मैदान पर खुरों की चाप।
सैकड़ों, हज़ारों,
क्षितिज भर
खुरों की चाप।
रौंदते, मथते।
रौंदते, मथते।
मेघनाद हाँकता दहाड़ को—
कंपाता है आवेश
मेरे भीतर।
बंधनमुक्त,
स्वतंत्र।
आवेश
आवेश
आवेश
सिहरता हुआ
फैली
तरंगित हथेलियों से
मेरे भीतर।
A poem by Pemba Umoja