बादल में फँसा
यादों की चोटी पर जमा हुआ
हवा इतनी पतली है,
मुश्किल से साँस आती है।
एक बादल के अंदर
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण—
कोहरे का हर पहलू तुम्हारी याद लिए चलता है:
तुम्हारी हँसी
तुम्हारी चोरी नज़र
तुम्हारे भारी कदम आगे बढ़ते हुए।
क्या ठंड में जमता सिर्फ मैं ही हूँ,
पहाड़ी की चोटी पर अकेला?
इतना जमा कि हिल नहीं सकता
जाने-पहचाने बादल गुज़रते हैं—
तंतु और भ्रम
जो मेरे दिल को गर्म रखते हैं
जबकि मेरा शरीर जमता है
और मेरी आत्मा बारिश में बदल जाती है
A poem by Pemba Umoja