प्रचुरता

छलछलाती लहरों पर तैरता सोना।

प्रचुरता — a poem by Pemba Umoja

जो कुछ भी चमकता है, सोना है

जब वह चितकबरे सागर पर झिलमिलाए।

इससे बड़ी कोई दौलत नहीं,

कोई बड़ा ख़ज़ाना नहीं,

उस सोने से जो

सैर करता है

थिरकती लहरों पर।

जितना चाहो यत्न करो

इंसानी इनाम बटोरने का।

तुम्हारा भला हो।

शायद कभी तुम भी मेरे साथ इस बेंच पर बैठो

एक चट्टानी टीले के पास,

और आख़िरकार देख पाओ

वह प्रचुरता जो

हम सबके लिए छोड़ी गई है।

इसे पाने की कोशिश करने की ज़रूरत नहीं।

यह हम सबके संजोने के लिए यहीं है।

समुद्र के ऊपर चमकती हुई,

पर्वत शिखरों से,

सूर्यास्त के भीतर,

चमकती हुई

ज्ञानी चाँद से,

उन सब की आँखों में

जो देख पाते हैं।

Pemba Umoja की एक कविता