एक कवि के बच्चे
जैसे जन्म की प्रतीक्षा करते बच्चे
कभी-कभी कविताएँ मेरे पास आती हैं
जैसे जन्म की प्रतीक्षा करते बच्चे
मुझे प्रसव-पीड़ा उठेगी
जब न कलम न काग़ज़ कहीं नज़र आएगा
व्याकुल होकर थामे हुए
उनकी नालें
गहरी घाटी के कगार से लटकते हुए
जब तक मुझे पाँव टिकाने की जगह न मिले
चट्टान की कोई कगार, जहाँ ठहर सकूँ
अपने बच्चों को अपने पास खींच सकूँ
ताकि वे
आ सकें
इस संसार में।
A poem by Pemba Umoja