एक आशियाना

प्रेम में पाया एक घर, साथ-साथ बढ़ते हर कदम।

एक आशियाना — a poem by Pemba Umoja

एक अंतहीन किनारा
धीरे से एक धागे में विलीन होता
एक धुंधले ब्रह्मांड में सिला हुआ।
ताज़ी रेत पर, मैं चलता हूँ,
चार कदम, साथ-साथ।
मेरे पास नन्हें क़दम
नए पदचिह्न बनाते हुए।
हर एक कदम
धुल जाता है
हवा, लहरों, और गिरते झाग से।
धूसर चाँद के नीचे अदृश्य पदचिह्न
इस किनारे पर,
मैं बंधा हुआ हूँ।
फिर भी मेरा घर नहीं बसता
इन हवा-भरी रेतों पर।
केवल बाहों में
मेरे प्रिय साथी की
मैंने एक विश्राम-स्थल पाया है
और हमारे धीमे, विनम्र कदमों में,
एक आशियाना।

A poem by Pemba Umoja